================मन्दाकिनी ==============
---------------------सागर ----------------------------
Tuesday, October 5, 2010
Wednesday, August 25, 2010
Sunday, August 22, 2010
Tuesday, August 17, 2010
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Sunday, August 15, 2010
sadh adhuri: ========+========
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........................>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>mere shyam<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<.........................
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Sunday, August 8, 2010
Sunday, July 18, 2010
मौन तुम्हारा
अतुल सुखदाई ये मौन तुम्हारा,
जीवन की डोर कों दिए सहारा ।
श्रवण रंध्र अमिय रस पान कर गए,
छलिया नहीं न ही नटखट कहें ,
बस याद में ये अन्खियाँ बहें।
तड़पना कहाँ तक न जाना कभी ,
विवश धैर्य ने भी किया किनारा ।
बिन बोले ही बोलते रहे राग में
भीगा ये तन मन अनुराग में।
मौन भंग की अब नहीं कामना ,
विपुल सुखदाई ये दिव्य सहारा।
लोक रंजन में कुछ भी डुबोया नहीं ,
देकर बहुत कुछ भी खोया नहीं ।
पूज्य कदमों में श्रद्धा सुमन सांवरे,
अर्पित करेगा ये जग सारा ।
rajni
जीवन की डोर कों दिए सहारा ।
श्रवण रंध्र अमिय रस पान कर गए,
नेत्र बोलने का दिव्य कम कर गए ।
रोम रोम में रचे बसे सांवरे,
छीन लिया हमसे ही ह्रदय हमारा ।
छलिया नहीं न ही नटखट कहें ,
बस याद में ये अन्खियाँ बहें।
तड़पना कहाँ तक न जाना कभी ,
विवश धैर्य ने भी किया किनारा ।
बिन बोले ही बोलते रहे राग में
भीगा ये तन मन अनुराग में।
मौन भंग की अब नहीं कामना ,
विपुल सुखदाई ये दिव्य सहारा।
लोक रंजन में कुछ भी डुबोया नहीं ,
देकर बहुत कुछ भी खोया नहीं ।
पूज्य कदमों में श्रद्धा सुमन सांवरे,
अर्पित करेगा ये जग सारा ।
rajni
निःशब्द
रिक्त शब्द कोष में तलाश रहे शब्द ,
किन्तु शून्य चेतना ह्रदय निःशब्द।
रंग पर्व पर लें बधाइयाँ विशेष
आर्य शक्तियां रहें संग सदा लब्ध। .......................उपेन्द्र
स्वाती
स्वाती की बूँद से, पपीहा को आप,
हरने को आये थे, घोर संताप ।
परम तृप्ति का परम कारन हो दिव्य,
साधक पपीहा की, निष्ठां हो आप।
हरने को आये थे, घोर संताप ।
परम तृप्ति का परम कारन हो दिव्य,
साधक पपीहा की, निष्ठां हो आप।
Friday, July 2, 2010
गर्व से कहो हम कायस्थ हैं.
कायस्थ समाज ने भारत कों सर्वधिक् महापुरुष दिए हैं .......महादेवी वर्मा ,मुंशी प्रेमचन्द्र ,रामकुमार वर्मा वृन्दावन लाल वर्मा,हरिवंश राय बच्चन ,सरोजनी नायडू ,.................डॉ राजेंद्र प्रसाद ,लाल बहादुर शास्त्री ,स्वामी विवेकानंद ,सुभाषचंद्र बोस ,महर्षि महेश योगी, वन्किम्चंद्र रविन्द्र नाथ टैगोर,अमिताभ बच्चन ,राजू श्रीवास्तव .......न ...जाने कितने ..कायस्थ उपनाम बदल कर काम करते हैं।
Thursday, July 1, 2010
स्मृतियाँ
जिनकी स्मृतियाँ महकें ,उनसे क्या बात करें ।
जो रोम रोम में मुखरित ,क्या मुलाकात करें ।
अहसास बड़े गहरे हैं ,अंतस तक है पैठ ,
बिन घात ह्रदय घायल है, कैसे प्रति घात करें ।
Monday, June 7, 2010
Saturday, May 29, 2010
प्रेम का सन्देश
चयन करके भिजाया है, तुम्हें विधना ने जगती पर.परम प्रिये प्रेम का सन्देश,सुनाने आज धरती पर।
विषैले सर्प दुश्मन से घिरे हैं आज चारों ओर,बने चन्दन लिए संग संग ,चले प्रिये आज किस पथ पर।
विषैले सर्प दुश्मन से घिरे हैं आज चारों ओर,बने चन्दन लिए संग संग ,चले प्रिये आज किस पथ पर।
Friday, May 28, 2010
Wednesday, May 19, 2010
Monday, May 17, 2010
जागते रहना है.
विवेक की कसौटी, परख की छमता ,शातिर मानकों से सुरछित रख सकती
है .भावुकता अभिशाप है.ईश्वर किसी कों भावुकता उपकृत न करे.
है .भावुकता अभिशाप है.ईश्वर किसी कों भावुकता उपकृत न करे.
Thursday, May 13, 2010
Wednesday, May 12, 2010
Monday, May 10, 2010
खजुराहो है शान हमारी
खजुराहो पर खास लिखें क्या ? खजुराहो है शान हमारी ।
शिल्प-शास्त्र का अनुपम उत्सव, पाषाणों में जान हमारी।
चन्देलों ने अमर किया है कला सहित इस कला सदन को ।
मधुमासी उत्सव नृत्यों का ,बुला रहा फिर रति मदन को ।
भोग -योग का अनुपम संगम ,और अनूठा हृदयंगम ये।
रति-मनोज की नगरी सा भी , त्रिनेत्र शिवधाम सहित ये ।
अध्यात्म प्रस्तर पर उतरा ,गूढ़ रहस्य लिए अपने में ।
शैलानी हतप्रभ रह जाते ,दांत तले उंगली सपने में ।
यह भारत है सारा भारत,जितेन्द्रिय जीवन शैली का।
ऋषियों की पावन धरती पर ,दिव्य देह की देहावली का।
पाषानों में पाठ लिखाहै,कालजयी भाषाशैली में।
अकथनीय कुछ कह नहीं पाए,कथाकार कितने रैली में।
संगीत-गीत शास्त्रीय बजा अब,थिरकन मनहर हरती मन कों।
नृत्य समेट लाये भारत कों,आर्य द्रविण नर्तन संगम कों।
उत्तर दच्छिन अटक- कटक तक,मानचित्र में जान हमारी।
खजुराहो पर खास लिखें क्या,खजुराहो है शान हमारी।
शिल्प-शास्त्र का अनुपम उत्सव, पाषाणों में जान हमारी।
चन्देलों ने अमर किया है कला सहित इस कला सदन को ।
मधुमासी उत्सव नृत्यों का ,बुला रहा फिर रति मदन को ।
भोग -योग का अनुपम संगम ,और अनूठा हृदयंगम ये।
रति-मनोज की नगरी सा भी , त्रिनेत्र शिवधाम सहित ये ।
अध्यात्म प्रस्तर पर उतरा ,गूढ़ रहस्य लिए अपने में ।
शैलानी हतप्रभ रह जाते ,दांत तले उंगली सपने में ।
यह भारत है सारा भारत,जितेन्द्रिय जीवन शैली का।
ऋषियों की पावन धरती पर ,दिव्य देह की देहावली का।
पाषानों में पाठ लिखाहै,कालजयी भाषाशैली में।
अकथनीय कुछ कह नहीं पाए,कथाकार कितने रैली में।
संगीत-गीत शास्त्रीय बजा अब,थिरकन मनहर हरती मन कों।
नृत्य समेट लाये भारत कों,आर्य द्रविण नर्तन संगम कों।
उत्तर दच्छिन अटक- कटक तक,मानचित्र में जान हमारी।
खजुराहो पर खास लिखें क्या,खजुराहो है शान हमारी।
Saturday, May 8, 2010
मिटी भ्रांतियां (मदर्स डे पर विशेष )
maatri दिवस विशेष पर
क्या ख़िताब दूँ
माँ तू तो सिर्फ
माँ रह
माँ पुकार लूँ।
आज भी आँचल में तेरे
वही श्रांत सुख
ओढ़ते ही
भूल जाती
घोर क्रूर दुःख ।
धरा सा धैर्य तेरा
धीरता दिए
कंटकों को मान पुष्प
अश्रु सब पिए
बज्र सा ह्रदय किये
बज्राघात सह
बिता ली ये जिन्दंगी
आपkकी
कहन कह कह ।
'मैं न जरी
सत्ती जरी '
कह , अग्नि से बची
गुलाब सी प्रफुल्ल दिखी
दर्द से खची ।
सीख ही तो काम
आई
नहीं क्रांतियाँ
सहन शक्ति बली हुई
मिटी भ्रांतियां ।
समर्पण
मैं मोहन की मीरा केवल
और न कोई नाम
नित उठ चरण- कमल कान्हा के
वंदन ही शुभकाम
न चाहूँ कोइ मान सम्मान
नहीं बनना है
मुझे महान
आशातीत अनोखे सुख में
डूब गए मन प्राण
अकथनीय
आनंद अमिय घट
छूटे न
रसपान
तृषा
अशेष
तृप्ति सविशेष
मुनि अगस्त की ओक हुआ है
जीवन भी ये शेष
सुखद पल अविरल अनुपम आन
कराते रसमय मधुमय पान
बसे मन मंदिर में आ श्याम
बना ये जीवन पर्व महान
नहीं शुभाशुभ का परिताप
भले दें दुरबासा ही शाप
नयन में श्याम ह्रदय में श्याम
मन वाणी में भी बस श्याम
ओर -छोर सब श्याम रंग के
श्यामल भूतल अम्बर श्याम
श्याम श्याम कह नाच उठी मैं
पग में डी लिए घुंघरू ।
Thursday, May 6, 2010
साध अधूरी
आज तो असीम श्याम
ठहर जाइए
भावमय ये विहार
ठहर जाइए
भावमय ये विहार
थिर बनाइये
नजर भर निहारने की
साध अधूरी
भाव सुमन सौंप करूँ
आज पूरी
पुष्पांजलि भरे
भाव रागनी
अभीष्ट ईष्ट राधना
की सौदामनी
बिखेर रही राग से
विरागनी प्रसून
sveekariye
पायेगी
पायेगी
बावरी शुकून
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