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Saturday, May 8, 2010

मिटी भ्रांतियां (मदर्स डे पर विशेष )

maatri दिवस विशेष पर


क्या ख़िताब दूँ


माँ तू तो सिर्फ


माँ रह


माँ पुकार लूँ


आज भी आँचल में तेरे


वही श्रांत सुख


ओढ़ते ही


भूल जाती


घोर क्रूर दुःख


धरा सा धैर्य तेरा


धीरता दिए


कंटकों को मान पुष्प


अश्रु सब पिए


बज्र सा ह्रदय किये


बज्राघात सह


बिता ली ये जिन्दंगी


आपkकी


कहन कह कह


'मैं जरी


सत्ती जरी '


कह , अग्नि से बची



गुलाब सी प्रफुल्ल दिखी


दर्द से खची


सीख ही तो काम

आई

नहीं क्रांतियाँ


सहन शक्ति बली हुई


मिटी भ्रांतियां

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