maatri दिवस विशेष पर
क्या ख़िताब दूँ
माँ तू तो सिर्फ
माँ रह
माँ पुकार लूँ।
आज भी आँचल में तेरे
वही श्रांत सुख
ओढ़ते ही
भूल जाती
घोर क्रूर दुःख ।
धरा सा धैर्य तेरा
धीरता दिए
कंटकों को मान पुष्प
अश्रु सब पिए
बज्र सा ह्रदय किये
बज्राघात सह
बिता ली ये जिन्दंगी
आपkकी
कहन कह कह ।
'मैं न जरी
सत्ती जरी '
कह , अग्नि से बची
गुलाब सी प्रफुल्ल दिखी
दर्द से खची ।
सीख ही तो काम
आई
नहीं क्रांतियाँ
सहन शक्ति बली हुई
मिटी भ्रांतियां ।
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