जीवन की डोर कों दिए सहारा ।
श्रवण रंध्र अमिय रस पान कर गए,
नेत्र बोलने का दिव्य कम कर गए ।
रोम रोम में रचे बसे सांवरे,
छीन लिया हमसे ही ह्रदय हमारा ।
छलिया नहीं न ही नटखट कहें ,
बस याद में ये अन्खियाँ बहें।
तड़पना कहाँ तक न जाना कभी ,
विवश धैर्य ने भी किया किनारा ।
बिन बोले ही बोलते रहे राग में
भीगा ये तन मन अनुराग में।
मौन भंग की अब नहीं कामना ,
विपुल सुखदाई ये दिव्य सहारा।
लोक रंजन में कुछ भी डुबोया नहीं ,
देकर बहुत कुछ भी खोया नहीं ।
पूज्य कदमों में श्रद्धा सुमन सांवरे,
अर्पित करेगा ये जग सारा ।
rajni
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