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Sunday, July 18, 2010

मौन तुम्हारा

अतुल सुखदाई ये मौन तुम्हारा,

जीवन की डोर कों दिए सहारा ।

श्रवण रंध्र अमिय रस पान कर गए,


नेत्र बोलने का दिव्य कम कर गए ।


रोम रोम में रचे बसे सांवरे,


छीन लिया हमसे ही ह्रदय हमारा ।

छलिया नहीं न ही नटखट कहें ,

बस याद में ये अन्खियाँ बहें।

तड़पना कहाँ तक न जाना कभी ,

विवश धैर्य ने भी किया किनारा ।

बिन बोले ही बोलते रहे राग में

भीगा ये तन मन अनुराग में।

मौन भंग की अब नहीं कामना ,

विपुल सुखदाई ये दिव्य सहारा।

लोक रंजन में कुछ भी डुबोया नहीं ,

देकर बहुत कुछ भी खोया नहीं ।

पूज्य कदमों में श्रद्धा सुमन सांवरे,

अर्पित करेगा ये जग सारा ।

rajni

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