मैं मोहन की मीरा केवल
और न कोई नाम
नित उठ चरण- कमल कान्हा के
वंदन ही शुभकाम
न चाहूँ कोइ मान सम्मान
नहीं बनना है
मुझे महान
आशातीत अनोखे सुख में
डूब गए मन प्राण
अकथनीय
आनंद अमिय घट
छूटे न
रसपान
तृषा
अशेष
तृप्ति सविशेष
मुनि अगस्त की ओक हुआ है
जीवन भी ये शेष
सुखद पल अविरल अनुपम आन
कराते रसमय मधुमय पान
बसे मन मंदिर में आ श्याम
बना ये जीवन पर्व महान
नहीं शुभाशुभ का परिताप
भले दें दुरबासा ही शाप
नयन में श्याम ह्रदय में श्याम
मन वाणी में भी बस श्याम
ओर -छोर सब श्याम रंग के
श्यामल भूतल अम्बर श्याम
श्याम श्याम कह नाच उठी मैं
पग में डी लिए घुंघरू ।
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