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Saturday, May 8, 2010

समर्पण





मैं मोहन की मीरा केवल




और न कोई नाम




नित उठ चरण- कमल कान्हा के




वंदन ही शुभकाम




चाहूँ कोइ मान सम्मान


नहीं बनना है

मुझे महान

आशातीत अनोखे सुख में


डूब गए मन प्राण


अकथनीय

आनंद अमिय घट

छूटे न

रसपान

तृषा

अशेष

तृप्ति सविशेष




मुनि अगस्त की ओक हुआ है




जीवन भी ये शेष




सुखद पल अविरल अनुपम आन




कराते रसमय मधुमय पान




बसे मन मंदिर में आ श्याम




बना ये जीवन पर्व महान




नहीं शुभाशुभ का परिताप




भले दें दुरबासा ही शाप




नयन में श्याम ह्रदय में श्याम




मन वाणी में भी बस श्याम




ओर -छोर सब श्याम रंग के




श्यामल भूतल अम्बर श्याम




श्याम श्याम कह नाच उठी मैं




पग में डी लिए घुंघरू ।

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