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Saturday, May 29, 2010

प्रेम का सन्देश

चयन करके भिजाया है, तुम्हें विधना ने जगती पर.परम प्रिये प्रेम का सन्देश,सुनाने आज धरती पर।
विषैले सर्प दुश्मन से घिरे हैं आज चारों ओर,बने चन्दन लिए संग संग ,चले प्रिये आज किस पथ पर।

sadh adhuri: भीगी चुनरिया

sadh adhuri: भीगी चुनरिया

Wednesday, May 19, 2010

भीगी चुनरिया

प्रेम में भीगी चुनरिया

कंटकों से तर डगर।

चल रहे लोहित पगों से

हार कर यीर भी मगर।

Monday, May 17, 2010

जागते रहना है.

विवेक की कसौटी, परख की छमता ,शातिर मानकों से सुरछित रख सकती
है .भावुकता अभिशाप है.ईश्वर किसी कों भावुकता उपकृत न करे.

Thursday, May 13, 2010

Wednesday, May 12, 2010

आस्था

ईश्वर को साक्छी मान कर ही प्रत्येक कार्य करना चाहिए ,सच्चे न्यायाधीश वे ही हैं।

भजन

भजन
इश्वर
को
सर्वाधिक
प्रिय
हैं।

भजन

भारत स्वाभिमान

भारत प्रतिकार
नहीं
प्रतिदान
पर
आस्था
रखता
है।

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Monday, May 10, 2010

खजुराहो है शान हमारी

खजुराहो पर खास लिखें क्या ? खजुराहो है शान हमारी ।
शिल्प-शास्त्र का अनुपम उत्सव, पाषाणों में जान हमारी।
चन्देलों ने अमर किया है कला सहित इस कला सदन को ।
मधुमासी उत्सव नृत्यों का ,बुला रहा फिर रति मदन को ।
भोग -योग का अनुपम संगम ,और अनूठा हृदयंगम ये।
रति-मनोज की नगरी सा भी , त्रिनेत्र शिवधाम सहित ये ।
अध्यात्म प्रस्तर पर उतरा ,गूढ़ रहस्य लिए अपने में ।
शैलानी हतप्रभ रह जाते ,दांत तले उंगली सपने में ।
यह भारत है सारा भारत,जितेन्द्रिय जीवन शैली का।
ऋषियों की पावन धरती पर ,दिव्य देह की देहावली का।
पाषानों में पाठ लिखाहै,कालजयी भाषाशैली में।
अकथनीय कुछ कह नहीं पाए,कथाकार कितने रैली में।
संगीत-गीत शास्त्रीय बजा अब,थिरकन मनहर हरती मन कों।
नृत्य समेट लाये भारत कों,आर्य द्रविण नर्तन संगम कों।
उत्तर दच्छिन अटक- कटक तक,मानचित्र में जान हमारी।
खजुराहो पर खास लिखें क्या,खजुराहो है शान हमारी।

Saturday, May 8, 2010

मिटी भ्रांतियां (मदर्स डे पर विशेष )

maatri दिवस विशेष पर


क्या ख़िताब दूँ


माँ तू तो सिर्फ


माँ रह


माँ पुकार लूँ


आज भी आँचल में तेरे


वही श्रांत सुख


ओढ़ते ही


भूल जाती


घोर क्रूर दुःख


धरा सा धैर्य तेरा


धीरता दिए


कंटकों को मान पुष्प


अश्रु सब पिए


बज्र सा ह्रदय किये


बज्राघात सह


बिता ली ये जिन्दंगी


आपkकी


कहन कह कह


'मैं जरी


सत्ती जरी '


कह , अग्नि से बची



गुलाब सी प्रफुल्ल दिखी


दर्द से खची


सीख ही तो काम

आई

नहीं क्रांतियाँ


सहन शक्ति बली हुई


मिटी भ्रांतियां

नया सबेरा

समर्पण





मैं मोहन की मीरा केवल




और न कोई नाम




नित उठ चरण- कमल कान्हा के




वंदन ही शुभकाम




चाहूँ कोइ मान सम्मान


नहीं बनना है

मुझे महान

आशातीत अनोखे सुख में


डूब गए मन प्राण


अकथनीय

आनंद अमिय घट

छूटे न

रसपान

तृषा

अशेष

तृप्ति सविशेष




मुनि अगस्त की ओक हुआ है




जीवन भी ये शेष




सुखद पल अविरल अनुपम आन




कराते रसमय मधुमय पान




बसे मन मंदिर में आ श्याम




बना ये जीवन पर्व महान




नहीं शुभाशुभ का परिताप




भले दें दुरबासा ही शाप




नयन में श्याम ह्रदय में श्याम




मन वाणी में भी बस श्याम




ओर -छोर सब श्याम रंग के




श्यामल भूतल अम्बर श्याम




श्याम श्याम कह नाच उठी मैं




पग में डी लिए घुंघरू ।

Thursday, May 6, 2010

साध अधूरी

आज तो असीम श्याम
ठहर जाइए
भावमय ये विहार
थिर बनाइये
नजर भर निहारने की
साध अधूरी
भाव सुमन सौंप करूँ
आज पूरी
पुष्पांजलि भरे
भाव रागनी
अभीष्ट ईष्ट राधना
की सौदामनी
बिखेर रही राग से
विरागनी प्रसून
sveekariye
पायेगी
बावरी शुकून

जितना नाजुक

उतना ही

दृढ

अंतस विश्वास

देवकृपा सा

रख लेता

है

पावन मन की लाज